The Vedas are not books, rather it is a knowledge originated in the hearts of Rishis.''Vedas are actually never created or destroyed. They merely get illuminated and de-illuminated but remain in Ishwar.''Adi Shankrachary Vedas are Apaurusheya (not created by humans)Kumarilbhatt
भगवान का नाम जपते समय संसार के बारे में नही सोचना चाहिए और संसार के काम करते समय भी भगवान को नही भूलना चाहिए l
जिसमे बचपन से ही या जवानी में भक्ति नही की वो बुढापे में क्या भक्ति करेगा ?
जैसे व्यापर वो बढिया होता है जिसमे अधिक लाभ हो उसी प्रकार साधना वही बढिया होती है जिसमे अधिक मन भगवान में लगे l
जैसे जैसे समाज में लोग केवल संसार को ही महत्व देना आरम्भ करते हैं और धर्म की उपेक्षा (ignore) करते हैं वैसे ही समाज में अशांति, अपराध, पाप बढ़ते हैं या यूं कहें कि धर्म की उपेक्षा करेंगे तो अधर्म बढ़ता है l
दुःख आता ही इस लिए है कि सुख की इच्छा छूट जाए l
भक्त को सदैव दूसरों कि सेवा करने का लालच होना चाहिए, दूसरों को सुख देकर भक्त स्वयं वहां पहुँच जायेगा जहाँ उसको कभी कोई दुःख नही होगा l
सुख पाना चाहते हो तो पहले दुसरों को सुख दो, जैसे बीज बोओगे, वैसी ही फसल काटोगे l
जो दूसरों को हानि पहुंचाता है वो भी वास्तव में अपनी ही हानि कर रहा है और जो दूसरों का भला कर रहा है वो वास्तव में अपना ही भला कर रहा है l
“दूसरे सुखी हो” - जब व्यक्ति ऐसा भाव रखेगा तो सब सुखी हो जायेंगे और स्वयं भी सुखी हो जायेगा परन्तु “मैं सुखी हो जाऊं” – जब व्यक्ति यह भाव रखेगा तो सब दुखी हो जायेंगे और व्यक्ति स्वयं भी दुखी हो जाएगा l
श्रेष्ठ भक्त वही है जो दूसरों की भलाई में लगा हुआ है l
जो सबका भला चाहता है, वो भगवान के हृदय में स्थान पाता है l
जो दूसरों का भला कर रहा है, वह कहीं भी रहे भगवान को पा लेगा l
जैसे कोई कम्पनी में अच्छा काम करने से कम्पनी का स्वामी प्रसन्न होता है, ऐसे ही संसार की सेवा करने से संसार के स्वामी (भगवान) प्रसन्न हो जाते हैं
संसार में दूसरों के लिए जैसा करोगे अपने लिए भी वैसा हो जायेगा, इसलिए सदैव दूसरों का भला करो l
जब कभी सेवा करने का अवसर मिले तो प्रसन्न होना चाहिए कि भाग्य खुल गया l
धार्मिक पुस्तकें, अच्छे विचारों और सत्संग से बुरे से बुरा संभाव भी अच्छा हो जाता है l
आज के समय में तो मनुष्य पशुओं से भी नीचे गिर रहा है, क्यूंकि पशु भी दूसरों का के अधिकार की वस्तुएं नही लेते, मनुष्य तो दूसरों का अधिकार मार रहा है l
हमारी कमाई में किसी दूसरे के अधिकार का एक रूपये न हो इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए l
कुछ करना है तो दूसरों की सेवा करो-कुछ जानना चाहते हो तो अपने आप को जानी -मानना चाहते हो तो भगवान् को मानो- तीनो का परिणाम एक ही होगा
हमे जिस व्यक्ति या वस्तु से मोह (जुड़ाव) हो, उसमे भी भगवान को ही देखना चाहिए l
प्रत्येक समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम किसी की हानि तो नही कर रहे हैं ?
जैसे बच्चा प्रत्येक स्थिति में माँ को ही पुकारता है इसी प्रकार भक्त को भी प्रत्येक स्थिति में भगवान को ही पुकारना चाहिए l
जिस कार्य को बाद में सीधा नही किया जा सके, उस उल्टेकार्य को कभी नही करना चाहिए l
चरित्र की सुन्दरता ही वास्तविक सुन्दरता है l
कितने आश्चर्य की बात है कि भगवान की दी हुई वस्तुएं अच्छी लगती है परन्तु भगवान नही अच्छे लगते l
भगवान श्रीरामके चरित्र बड़े अलौकिक थे l इसी आदर्शको हिंदु-संस्कृति कहते हैं l हमें उसी आदर्शको लक्ष्यमें रखकर उसका अनुसरण करना चाहिये l हिंदु-संस्कृतिके स्वरूपको बतलानेके लिये रामायण एक महान आदर्श ग्रन्थ है l सभीको यह ग्रन्थ पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना चाहियl हमारे हृदयोंमें भगवान् छिपे हुए हैं; क्योंकि जिस विश्वाससे भगवान् प्रकट होते हैं, वह विश्वास हममें नहीं है ।
🚩ये संसार तो नि:सार है,इसका सार तो केवल भगवान ही जानते हैं l 🔸वह कुल पवित्र हो गया🔸वो देश पवित्र हो गया 🙏जहाँ हरि के दास ने जन्म लियाl
💖हमेशा भगवान के नाम का कीर्तन और भगवान की कथा का गान होने से मन में अखंड आनंद बना रहता है 🌞भगवान के प्रेमी भक्त जहाँ भगवान के नाम का कीर्तन करते हैं, भगवान तो वहीं रहते हैं l
भगवान के वचन हैं – मेरे भक्त प्रेम से जहाँ मेरे नाम का कीर्तन करते हैं, वहां तो मैं स्वयं रहता हूँ, मैं और कहीं न मिलूं तो मुझे वहां ढूंढो l भगवान के नाम का कीर्तन करने से संसार का दुःख दूर होता है, हर जगह महासुख भर जाता है l कीर्तन से तो वैकुण्ठ धरती पर आ जाता है l भगवान स्वके हृदय का भाव जानते हैं, उन्हें बताना नही पड़ता l किसी वस्तु की कामना करने वाले मनुष्य की जब एक इच्छा पूरी होती है तब दूसरी नई इच्छा उत्पन्न हो जाती है, इस प्रकार तृष्णा एक तीर की तरह मनुष्य के पेट पर चोट करती ही रहती है l छोटे बड़े सबका शरीर नारायण का ही शरीर है l हम भगवान् से एक पल के लिए भी अलग नही हो सकते और संसार से हमेशा हमेशा के लिए जुड़े भी नही रह सकते प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहने की समझ सत्संग से ही आती है l यदि भीतर सच्ची लग्न नही हो तो सत्संग की बातें पचती नही l भगवान के भक्त को अपने आप से ये प्रश्न करना चाहिए कि आप मुझसे किसी को कोई लाभ नही हुआ, किसी की सेवा नही हुई, किसी के मन को शांति नही मिली तो मैं कैसा भक्त हुआ ? 🌞हे प्रभु तुम्हारे नाम का कीर्तन छोड़ कर अब मैं और कोई काम नही करूँगा, अब लज्जा छोड़ कर तुम्हारे रंग में नाचूँगा l
जैसा अन्न वैसी बुद्धि l जैसा संग वैसी बुद्धि l अतएव सज्जनका संग करो l आत्माका कल्याण करनेवाली पुस्तक पढ़ो और मेहनत करके अपने हकका खाओ l- मनुष्य संसारमें जितनी चीजोंको अपनी और अपने लिये मानता है उतना ही वह फँसता है l एक संत ने कहा है -लोगोंके छिपे हुए ऐब जाहिर मत करो l इससे उसकी इज्जत तो जरूर घट जाएगी, पर तेरा तो ऐतबार ही उठ जाएगा l चरित्र एक वृक्ष है, मान एक छाया। हम हमेशा छाया की सोचते हैं, लेकिन असलीयत तो वृक्ष ही है। ऊपर से हम अपनेको जितना अच्छा दिखाते हैं उससे कहीँ अच्छा हमें अन्दर से होना चाहिये l
शरीर-इंद्रियां-मन-बुद्धिसे अपना सम्बन्ध न रखना ही सच्चा एकान्त है l किसी तरह भगवान में लग जाओ, फिर भगवान अपने-आप सम्भालेंगे l संसार अधूरा है, इसलिये अधूरा ही मिलता है और परमात्मा पूरे हैं, इसलिये पूरे ही मिलते हैं l परमात्मा दूर नहीँ हैं, केवल उनको पानेकी लगनकी कमी है l जीव जब लायक होता है, तब भगवान दर्शन देते हैं l जीव लायक नहीँ है, इसलिये भगवान दर्शन नहीँ देते l आपकी प्रेरणाके बिना मन पाप नहीँ कर सकता है l मन स्वतन्त्र नहीँ है, मन नौकर है l आप अपने मन को सत्कर्ममें लगा दो l नहीँ तो, वह पाप करेगा l .💖मन की एक बात बहुत अच्छी है, इसे जिस बात का चस्का लग जाये ये फिर उसे नही छोड़ता 💖 इसलिए इसे भगवान के नाम के कीर्तन का चस्का लगवा देना चाहिए l 💖हमेशा भगवान के नाम का कीर्तन और भगवान की कथा का गान होने से मन में अखंड आनंद बना रहता है बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनता से मिलता है)।
Adi Shankaracharya established 4 Peeth or Muths
in the 4 directions of India -
श्रीमद् आदिशंकराचार्य ने चार दिशाओं में चार पीठ स्थापित कीं ।
आद्य शंकराचार्य
की चार पीठ ll
1. First was Shri
Govardhan Peeth, in the East direction now in the State of Orrisa at Jagganath
Puri. It was based on the Rigved, with Mahavakya- प्रज्ञानं ब्रह्म
(Prajnanam Brahma).
The first
Shankaracharya of acharya
Hastamalakacharyaa and the current one is Swami Nishchaland Saraswati.
1. पहली
पीठ श्री गोवर्धनपीठ है जो कि पूर्व दिशा में है, यह ऋग्वेद पर
आधारित है ।
इस पीठ के सबसे पहले
शंकराचार्य स्वामी ह्स्त्मलकआचार्य थे और वर्तमान
में स्वामी निश्छलानंद सरस्वती जी विद्यमान हैं ।
इस पीठ का महावाक्य
है :- 'प्रज्ञानं
ब्रहम्'
2. The second Peeth established was in the west direction,
called Sharada Peetham, based on Samved, with Mahavakya- Aham Brahmasmi
currently in Dwarka,
Gujarat. The first Shankaracharya of it wasPadmapadacharyaas and currently is Swami Swaroopanand Saraswati.
2. दूसरी
पीठ श्रीद्वारकाशारदा पीठ है जो कि पश्चिम दिशा में है, यह सामवेद
पर आधारित है ।
इस पीठ के सबसे पहले
शंकराचार्य थे पद्मपाद और वर्तमान में स्वरूपानंद सरस्वती जी विद्यमान हैं ।
इस पीठ का महावाक्य
है :- 'अहं ब्रह्मास्मि'
3. The third Peeth was established in the north in the Badri
of Uttarakhand state called Jyotirmath Peetham, based on Atharvaved with
Mahavakya - Tattvamasi. Its first Shankaracharya was Totakacharya and
currently is Swaroopanand Saraswati.
3. तीसरी
पीठ उत्तर दिशा में है जिसे ज्योतिर्मठ पीठ कहा जाता है, बद्रिकाश्रम
के नाम से भी जाना जाता है । यह पीठ अथर्ववेद पर आधारित है ।
इस पीठ के सर्वप्रथम
शंकराचार्य श्रीतोटकाचार्य थे और वर्तमान में श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी विद्यमान
हैं ।
इस पीठ का महावाक्य
है :- 'तत्वमसि'
4. The fourth Peeth established was in the south, based on
Yajurved with Mahavakya- अयमात्मा ब्रह्म
(Ayamatma Brahma it is now in Shringeri in Karnataka. The
first Shankaracharya was Sureshwaracharya and currently is Swami Bharti Teerth.
4. चौथी
पीठ दक्षिण दिशा में है, यह श्रंगेरी पीठ के नाम से जाना जाता
है, कर्नाटक राज्य में।
यह यजुर्वेद पर आधारित
है ।सुरेश्वराचार्य
(मण्डन मिश्र) जी
इस पीठ के पहले शंकराचार्य
सुरेश्वराचार्य जी थे और वर्तमान में स्वामिश्री भारती तीर्थ जी विद्यमान हैं ।
इस पीठ का महावाक्य
है :- 'अयमात्मा
ब्रह्म'
Hastamalakacharyaas
the Acharya of the Govardhana
Sureshwaracharyaas the
Acharya of Sringeri Sharada
Padmapadacharyaas the Acharya of
the Dwaraka Math
Sri Totakacharya as the Acharya
of Jyotir Math in the North
प्रस्तुत हैं विवेकचूड़ामणि के महत्वपूर्ण श्लोक हिंदी अर्थ सहित
जिसमे यह जगत का आभास दर्पण में प्रतिबिम्बित नगर के समान प्रतीत हो रहाहै, वह ब्रह्म ही मैं हूँ, ऐसा जान लेने पर तुम कृतकृत्य हो जाओगे ।
That in which there is this reflection
of the universe, as of a city in a mirror – that Brahman art thou; knowing this
thou wilt attain the consummation of thy life.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
जो निर्विकल्प, महान और अविनाशी है, क्षर (शरीर) और अक्षर (जीव) - सेभिन्न है तथा नित्य, अव्यय, आनंदस्वरूप और निष्कलंक है वह ब्रह्म ही तुम हो -
ऐसी ह्रदय में भावना करो ।
That which is free from duality; which
is infinite and indestructible; distinct from the universe and Maya, supreme,
eternal; which is undying Bliss; taintless – that Brahman art thou, meditate on
this in thy mind.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
जिस प्रकार जल आदि के संसर्गवश [किसी अन्य] अत्यंत दुर्गन्धयुक्त
वस्तु का लेप चढ़ जाने से दबी हुई अगरूकी दिव्य सुगंध संघर्षण (घिसने) के
द्वारा ही बाह्य दुर्गन्ध के दूर होने पर फिर अच्छी तरह प्रतीत होती है; उसी
प्रकार अंत:करण में स्थित अनन्त दुर्वासनारुपी धूलि से ढकी हुई परमात्मावासना
बुद्धि के अत्यंत संघर्ष से शुद्ध होकर चन्दन की गंध के समान ही स्पष्ट प्रतीत
होने लगती है ।
The lovely odour of the Agaru
(agalochum) which is hidden by a powerful stench due to its contact with water
etc., manifests itself as soon as the foreign smell has been fully removed by
rubbing.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
रजोगुण और सत्त्वगुण से तं,
सत्त्वगुण से रज और
शुद्ध सत्त्व से
सत्त्वगुण का नाश होता है,
इसलिए शुद्ध सत्त्व
का आश्रय लेकर अपने अध्यास कात्याग करो ।
Tamas is destroyed by both Sattva and
Rajas, Rajas by Sattva, and Sattva dies when purified. Therefore do way with
thy superimposition through the help of Sattva.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
प्रारब्ध ही शरीर का पोषण कर्ता है,
ऐसा निश्चय कर निश्चलभाव
से धैर्यधारण करके यत्नपूर्वक अपने अध्यास को छोडो ।
Knowing for certain that the Prarabdha
work will maintain this body, remain quiet and do away with thy superimposition
carefully and with patience.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
मैं जीव नहीं हूँ, परब्रह्म हूँ, इस प्रकार अपने में जीव भाव का निषेध
करते हुए, वासनात्रय के वेग से
प्राप्त हुए जीवतत्व के अध्यास का त्याग करो ।
"I am not the individual soul, but
the Supreme Brahman" – eliminating thus all that is not-Self, do away with
thy superimposition, which has come through the momentum of (past) impressions.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
जब तक स्वप्न के समान जीव और जगत की प्रतीति हो रही है, तब तक हे विद्वन!
अपने आत्मा में हुए इस अध्यास का निरंतर त्याग करते रहो ।
So long as even a dream-like perception
of the universe and souls persists, do away with thy superimposition, O learned
man, without the least break.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
हे मुने! [घट का नाश होने पर] जैसे घटाकाश माहाकाश में मिल जाता है, वैसेही जीवात्मा को परमात्मा में लीन करके सर्वदा अखण्डभाव से मौन होकर स्थित
रहो ।
Merging the finite soul in the Supreme
Self, like the space enclosed by a jar in the infinite space, by means of
meditation on their identity, always keep quiet, O sage.
श्रीमद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक-चूड़ामणि
Vivek-Chudamani by Shrimad Adi
Shankaracharya
जो सर्वदा सत और सुवर्ण के समान स्वयं निर्विकार है तथापि भ्रमवश [उसकेविकार कटक-कुंडलादि के समान ] नाना नाम, रूप, गुण और विकारों के रूप में भासता है वह ब्रह्म तुम ही हो - ऐसा अपने चित्त में चिन्तन करो ।
That Reality which (though One) appears
variously owing to delusion, taking on names and forms, attributes and changes,
Itself always unchanged, like gold in its modifications – that Brahman art
thou, meditate on this in thy mind.