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रामसुखदासजी सुविचार 2


  • मनसे भगवान् का चिंतन, वाणीसे भगवान् के नामका जप, सबको नारायण समझकर शरीर से जगज्जनार्दनकी नि:स्वार्थ सेवा यही उत्तम-से-उत्तम कर्म है ।
  • जिसका समय व्यर्थ होता है, उसने समय का मूल्य समझा ही नहीं । 
  •  जो संसार समुद्र से कुछ लेना चाहता है वह डूब जाता है और जो देना चाहता है वह पार हो जाता है l
  • अपने हित की अपेक्षा जब परहित को अधिक महत्व मिलेगा तभी सच्चा सतयुग प्रकट होगा। 



  • अपनी दिनचर्या में परमार्थ को स्थान दिये बिना आत्मा का निर्मल और निष्कलंक रहना संभव नहीं।
  • १ स्नान और नित्यकर्म किये बिना दातुन और जलके सिवा कुछ भी मुख में न लें ।
  • २ श्रीभगवान् के भोग लगाकर तथा यथादिकार बलिवैश्वदेव करके ही भोजन करें ।
  • ३ तुलसीदल के सिवा चलते फिरते या खड़े हुए कोई भी चीज कभी न खाय ।
  • ४ भोजन के आदि और अंत में आचमन करे ।
  • धन किसी को अपना दास नहीं बनाता, मनुष्य स्वयं ही धन का दास बन कर अपना पतन कर लेता है l
  • मुक्ति इच्छाओं के त्याग से होती है वस्तुओं के त्याग से नही l 
  • यदि आप चाहते हैं कि कोई भी मुझे बुरा न समझे तो दूसरों को बुरा समझने का भी आपको कोई अधिकार नही है l
  • मनुष्य का अंत:करण जितना अपवित्र होता है उतना ही उसे दूसरों के दोष दिखते हैं l
  • दूसरों का दोष देखने से ना तो हमारा भला होता है न दूसरों का l
  • जैसा मैं चाहूं वैसा हो जाये यह इच्छा जब तक रहेगी, तब तक शांति नही मिल सकती l
  • मनुष्य समझदार होकर भी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओं को चाहता है, ये कितने आश्चर्य की बात है l
  • जितना हो सके दूसरों की आशाएं पूरी करने का प्रयास करो परन्तु दूसरों से आशा मत रखो l
  • परमात्मा की अभिलाषा करते हो तो संसार की अभिलाषाओं को छोडो l
  • कामना के कारण ही कमी है, कामना से रहित होने पर कोई कमी नही रहती l
  • दया के सामान कोई धर्म नहीं, हिंसा के सामान कोई पाप नहीं, ब्रह्मचर्य के सामान कोई व्रत नहीं, ध्यान के सामान कोई साधन नहीं, शान्ति के सामान कोई सुख नहीं, ऋणके सामान कोई दुःख नहीं, ज्ञान के सामान कोई पवित्र नहीं, ईश्वर के सामान कोई इष्ट नहीं, पापी के सामान कोई दुष्ट नहीं — ये एक-एक अपने –अपने स्थान पर अपने-अपने विषयमें सबसे बढ़कर प्रधान हैं । 
  • मनुष्य-जीवन के समय को अमूल्य समझकर उत्तम-से-उत्तम काममें व्यतीत करना चाहिये। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये ।







रामसुखदासजी सुविचार 1


🚩एकांत में रहते हुए,

🚩 गंगा स्नान करते हुए,

🚩 भगवान का पूजन करते हुए,

🚩श्री तुलसी कि परिक्रमा करते हुए

🚩श्री हरि के चिन्तन में भी समय व्यतीत करें l




💠
जैसे बच्चा खेलते खेलते माँ को भूल भी जाए पर माँ कभी बच्चे को नही भूलती

💠
ऐसे ही उस परमात्मा का प्रेम तो माता से कहीं अधिक है, तो मैं क्यों चिंता करूँ भगवान स्वयम मेरा भार उठाएंगे l

गीतामें सैकड़ों ऐसे श्लोक हैं जिनमें से एक को भी पूर्णतया धारण करनेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है, फिर सम्पूर्ण गीताकी तो बात ही क्या है
जबतक अपनी इच्छा रखोगे, तबतक संसार आदर नहीं करेगा।




🔔अपनी इच्छा छोड़ कर व्यवहार करो।"-

🚩श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज🚩
🔔"स्वार्थ के कारण खुद खाने में आनंद आता है।

🔔 स्वार्थ न हो तो दूसरों को खिलाने में आनंद आता है।"-

🚩श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज🚩

🔔जहाँ राग-द्वेष,
हर्ष-शोक,
अच्छा-मंदा,
अनुकूल-प्रतिकूल आदि दो चीजें रहती हैं, वह संसार है।

🔔दो चीजें मिटकर एक समता हो जाए तो वह परमात्मा है।"-
🚩श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज🚩




गीताप्रेस सुविचार भाग 6



  • महाराज युधिष्ठिरने स्वर्गको ठुकरा दिया, पर अपने अनुगत कुत्तेका भी त्याग नहीं किया ।
  • पाण्डवोंने अपनेसे निम्नश्रेणी के राजा विराटकी नौकरी स्वीकार कर ली, पर धर्म का किंचिन्मात्र भी कभी त्याग नहीं किया ।
  • धैर्य, क्षमा, मनोनिग्रह, अस्तेय, बाहर-भीतर की पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, सात्त्विकबुद्धि, अध्यात्मविद्या, सत्यभाषण, और क्रोध न करना— ये दस सामान्य धर्मके लक्षण हैं ।
  • सर्वस्व जाय तो भी कभी किसी निमित्तसे कहीं किन्चिन्मात्र भी पाप न करे, न करवावे और न उसमे सहमत ही हो ।
  • महापुरुषों के प्रभाव से भगवान् की प्राप्ति होना — यह तो उनका अलौकिक प्रभाव है तथा सांसारिक कार्य की सिद्धि होना — लौकिक प्रभाव है ।
  • मरुभूमि में जल दीखता है, वास्तव में है नहीं । अत: कोई भी समझदार मनुष्य प्यासा होते हुए भी वहाँ जलके लिये नहीं जाता । इसी प्रकार संसार के विषयों में भी सुख प्रतीत होता है, वास्तव में है नहीं । ऐसा जाननेवाले विरक्त विवेकी पुरुष की सुख के लिये उसमे कभी प्रवृत्ति नहीं होती ।
  • आसक्ति वाले पुरुषके मनके अनुकूल होने पर राग और हर्ष तथा प्रतिकूल होने पर द्वेष और दुःख होता है ।
  • झूठसे बचने के लिये जहाँ तक हो, भविष्यके निश्चित वचन नहीं कहने चाहिये ।
  • संसार के किसी भी प्रदार्थ से आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि आसक्ति होने से अन्तकाल में उसका संकल्प हो सकता है । संकल्प होनेपर जन्म लेना पड़ता है ।
  • बार बार मन से पूछे कि “ बतला, तेरी क्या इच्छा है ?” और मनसे यह उत्तर मिले कि “कुछ भी इच्छा नहीं है ।“ इस प्रकार के अभ्यास से इच्छा का नाश होता है । यह निश्चित बात है ।
  • जिसने सत्य,अहिंसा,क्षमा,दया,समता,शान्ति,संतोष,सरलता,तितिक्षा, त्याग आदि शस्त्र धारण कर रखें हैं , उसका कोई भी शत्रु किंचिन्मात्र भी अनिष्ट नहीं कर सकता ।
  • विशुद्ध ईश्वर-प्रेम एक बहुत गोपनीय परम रहस्य की वस्तु है । उससे बढ़कर संसार में कोई उत्तम वस्तु नहीं ।
  • सदा-सर्वदा ईश्वर पर निर्भर रहना चाहिये । इससे धीरता, वीरता, गंभीरता, निर्भयता और आत्मबलकी वृद्धि होती है ।
  • ईश्वर की सत्ता पर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास रखे; क्योंकि ईश्वर पर जितना प्रबल विश्वास होगा, साधक उतना ही पाप से बचेगा और उसका साधन तीव्र होगा । 
  • जिसमे प्राणियों की हिंसा होती हो, ऐसी किसी चीज को व्यवहार में न लावें।
  • धन का प्राप्त होना यद्यपि अपने वश की बात नहीं है, तथापि मनुष्य को शरीरनिर्वाह के लिये कर्तव्यबुद्धिसे न्याययुक्त परिश्रम तो अवश्य करना चाहिये ।
  • अकर्मण्यता(कर्तव्यसे जी चुराना) महान हानिकारक है। पाप का प्रायश्चित है, किन्तु इसका नहीं । अकर्मण्यता का त्याग ही इसका प्रायश्चित है ।
  • भगवान् के नाम-रूपको याद रखते हुए ही सामाजिक, व्यवहारिक, आर्थिक आदि काम नि:स्वार्थ भाव से करे ; क्योंकि अपनी सारी चेष्टा नि:स्वार्थभाव से दूसरे के हित के लिये करने से ही कल्याण होता है । 
  • भगवत्प्राप्ति पवित्र और एकान्त देश का सेवन, सत्संग और स्वाध्याय , परमात्माका ध्यान और उसके नाम का जप, निष्कामभाव, ज्ञान, वैराग्य और उपरति — इनके सामान कोई भी साधन नहीं है ।
  • ब्रह्ममुहूर्त में उठाना चाहिये । यदि सोते- सोते ही सूर्योदय हो जाय तो दिनभर उपवास और जप करना चाहिये । 
  • सुननेवालों की इच्छा के बिना वक्ता को सत्संग के सहस्य की बातें नहीं सुनानी चाहिये । 
  • भगवान् के सामान अपना कोई हितैषी नहीं है, अत: अपने अधीन सब पदार्थों को और अपने को राजा बलि की भाँती भगवान् के समर्पण कर देना चाहिये । 
  • एकांत में मन को सदा यही समझाना चाहिये कि परमात्मा के चिंतन के सिवा किसी का चिंतन न करो; क्योंकि व्यर्थ चिंतन से बहुत हानि है । 
  • सोते समय भी भगवान् के नाम, रूपका स्मरण विशेषतासे करना चाहिये, जिससे शयन का समय व्यर्थ न जाय । शयनके समय को साधन बनाने के लिये सांसारिक संकल्पोंके प्रवाहको भुलाकर भगवान् के नाम,रूप,गुण,प्रभाव, चरित्रका चिंतन करते हुए ही सोना चाहिये । 
  • भोजन के समय स्वाद की और ध्यान नहीं देना चाहिये;क्योंकि यह पतन का हेतु है । स्वास्थ्य की ओर लक्ष्य रखना भी वैराग्य में कमी ही है ।


गीताप्रेस सुविचार भाग 5



  1. जो भगवान, गुरु, ग्रन्थों से डरता है वही सच्चा वीर है l
  2. कोई हमे अपनी ख़ुशी से कोई चीज़ दे तो वो चीक दूध जैसी है,-हम किसी वस्तु को मांग रहे हैं तो वो चीज़ पानी जैसी है,-हम किसी चीज को छीन के दूसरों का दिल दुखा कर लें तो वो वस्तु रक्त जैसी है l
  3. जब हम सबकी बात नही मानते तो दूसरा हमारी बात नही मानता तो हमे नाराज नही होना चाहिए l 
  4. सच्चे धार्मिक व्यक्ति को दुनिया की कोई वस्तु नही चाहिए बल्कि दुनिया उसके पीछे फिरती है l
  5. धर्म के अनुसार स्वयं चलना ही धर्म का सबसे बड़ा प्रचार है l
  6. धर्म का मूल है:-स्वर्थ का त्याग, दूसरों का भला करना
  7. भारत में जन्म लेकर भी मनुष्य धर्म में न लगे ये बड़े आश्चर्य तथा दुःख की बात है क्योंकि धर्म ही तो भारत की अरमा है, भारत में जन्म मिलना अर्थात भगवान की कृपा होना, भारत में जन्म ही धर्म की प्राप्ति के लिए मिलता है l
  8. वस्तुमात्र को भगवान् का स्वरुप और चेष्टामात्र को भगवान् की लीला समझने समझने से भगवान् का तत्त्व समझ में आ जाता है ।
  9. सर्वत्र भगवद्भावके सामान कोई भाव नहीं है और सर्वत्र भगवद्भाव होने से दुर्गुण और दुरुचारों का अत्यंत अभाव होकर सद्गुण और सदाचार अपने–आप ही आ जाते हैं ।
  10. भगवान् बहुत बड़े दयालु और प्रेमी हैं । जो साधक उनका तत्त्व समझ जायगा, वह भगवान् की शरण होकर शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जायगा ।
  11. प्रेमपूर्वक जप-सहित भगवान् के ध्यान का अभ्यास, श्रद्धापूर्वक सत्पुरुषोंका संग, विवेकपूर्वक भावसहित सत- शास्त्रों का स्वाध्याय, दु:खी, अनाथ, पूज्यजन तथा वृद्धों की नि:स्वार्थभावसे सेवा — इनको यदि कर्तव्यबुद्धिसे किया जाय तो ये एक-एक साधन शीघ्र कल्याण करने वाले हैं ।
  12. जिसने ईश्वर की दया और प्रेम के तत्त्व-रहस्य को जान लिया है, उसके शान्ति और आनन्द की सीमा नहीं रहती ।
  13.  शीघ्र कल्याण चाहने वाले मनुष्य को परमात्माकी प्राप्ति के सिवा और किसी भी बात की इच्छा नहीं रखनी चहिये; क्योंकि इसके सिवा सब इच्छाएँ जन्म-मृत्यु रूप संसार-सागर में भरमाने वाली हैं 
  14.  श्रद्धा होने पर श्रद्धेय पुरुष की छोटी-से-छोटी क्रिया में भी बहुत ही विलक्षण भाव प्रतीत होने लगता है ।
  15.  ईश्वर, महात्मा, शास्त्र और परलोक में विश्वास करने वाले पुरुष से कभी पाप नहीं बन सकते । उसमे धीरता, वीरता, गम्भीरता, निर्भयता, समता और शान्ति आदि अनेक गुण अनायास ही आ जाते हैं, जिससे उसके सारे आचरण स्वाभाविक ही उत्तम-से-उत्तम होने लगते हैं । 
  16.  भगवान् के नाम,रूप, गुण , प्रभाव, तत्त्व, रहस्य और चरित्रों को हर समय याद करते हुए मुग्ध रहना चाहिये ।
  17.  एकान्त में भगवान् के आगे करुण भाव से रोते हुए स्तुति प्रार्थना करने से भी श्रद्धा बढती है ।
  18.  भगवान् के गुण, प्रभाव, चरित्र तत्त्व और रहस्य की बातें सुनने, पढ़ने और मनन करने से श्रद्धा होती है ।
  19. शौचाचारसे सदाचार बहुत ऊँचा है, उस से भी भगवान् की भक्ति और ऊँचे दर्जे की चीज है ।
  20. मन और इन्द्रियोंको इस प्रकार वशमें रखना चाहिये कि जिस से व्यर्थ और पापके काममें न जाकर जहाँ हम लगाना चाहें उसी भगवत्प्राप्ति के मार्ग पर लगी रहें ।
  21. अपने द्वारा किसी का अनिष्ट हो जाय तो सदा उसका हित ही करता रहे, जिससे कि अपने किये हुए अपराध को वह मनसे भूल जाय, यही इसका असली प्रायश्चित है ।
  22. अपने पर किये हुए उपकार को आजीवन कभी न भूले एवं अपकार करने वाले का बहुत भारी प्रत्युपकार करके भी अपने ऊपर उसका अहसान ही समझे ।
  23. अनिष्ट करने वाले के साथ बदले में बुराई न करे, उसे क्षमा कर दे; क्योंकि प्रतिहिंसा का भाव रखने से मनुष्य दोष का भागी होताकिसी के भी दुर्गुण-दुराचार का दर्शन, श्रवण, मनन, और कथन नहीं करना चाहिये। यदि उसमे किसी का हित हो तो कर सकते हैं; किन्तु मन धोखा दे सकता है, अत: खूब सावधानी के साथ विचार पूर्वक करना चाहिये । है ।
  24. दूसरों को दुःख पहुँचाने के सामान कोई पाप नही है और सुख पहुँचाने के सामान कोई धर्म नहीं है । इसलिये हर समय दूसरों के हित के लिये प्रयत्न करना चाहिये ।
  25. स्त्रीके लिये पातिव्रत्यधर्म ही सबसे बढ़कर है । इसलिये भगवान् को याद रखते हुए ही पतिकी आज्ञा का पालन विशेषता से करना चाहिये तथा पतीके और बड़ों के चरणों में नमस्कार करना और उनसबकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिये ।







गीताप्रेस सुविचार भाग 4


  1. भगवान का नाम जपते समय संसार के बारे में नही सोचना चाहिए और संसार के काम करते समय भी भगवान को नही भूलना चाहिए l
  2. जिसमे बचपन से ही या जवानी में भक्ति नही की वो बुढापे में क्या भक्ति करेगा ?
  3. जैसे व्यापर वो बढिया होता है जिसमे अधिक लाभ हो उसी प्रकार साधना वही बढिया होती है जिसमे अधिक मन भगवान में लगे l



  1. जैसे जैसे समाज में लोग केवल संसार को ही महत्व देना आरम्भ करते हैं और धर्म की उपेक्षा (ignore) करते हैं वैसे ही समाज में अशांति, अपराध, पाप बढ़ते हैं या यूं कहें कि धर्म की उपेक्षा करेंगे तो अधर्म बढ़ता है l
  2. दुःख आता ही इस लिए है कि सुख की इच्छा छूट जाए l
  3. भक्त को सदैव दूसरों कि सेवा करने का लालच होना चाहिए, दूसरों को सुख देकर भक्त स्वयं वहां पहुँच जायेगा जहाँ उसको कभी कोई दुःख नही होगा l
  4. सुख पाना चाहते हो तो पहले दुसरों को सुख दो, जैसे बीज बोओगे, वैसी ही फसल काटोगे l
  5. जो दूसरों को हानि पहुंचाता है वो भी वास्तव में अपनी ही हानि कर रहा है और जो दूसरों का भला कर रहा है वो वास्तव में अपना ही भला कर रहा है l
  6. “दूसरे सुखी हो” - जब व्यक्ति ऐसा भाव रखेगा तो सब सुखी हो जायेंगे और स्वयं भी सुखी हो जायेगा परन्तु “मैं सुखी हो जाऊं” – जब व्यक्ति यह भाव रखेगा तो सब दुखी हो जायेंगे और व्यक्ति स्वयं भी दुखी हो जाएगा l
  7. श्रेष्ठ भक्त वही है जो दूसरों की भलाई में लगा हुआ है l
  8. जो सबका भला चाहता है, वो भगवान के हृदय में स्थान पाता है l
  9. जो दूसरों का भला कर रहा है, वह कहीं भी रहे भगवान को पा लेगा l 
  10. जैसे कोई कम्पनी में अच्छा काम करने से कम्पनी का स्वामी प्रसन्न होता है, ऐसे ही संसार की सेवा करने से संसार के स्वामी (भगवान) प्रसन्न हो जाते हैं 
  11. संसार में दूसरों के लिए जैसा करोगे अपने लिए भी वैसा हो जायेगा, इसलिए सदैव दूसरों का भला करो l
  12. जब कभी सेवा करने का अवसर मिले तो प्रसन्न होना चाहिए कि भाग्य खुल गया l
  13. धार्मिक पुस्तकें, अच्छे विचारों और सत्संग से बुरे से बुरा संभाव भी अच्छा हो जाता है l
  14. आज के समय में तो मनुष्य पशुओं से भी नीचे गिर रहा है, क्यूंकि पशु भी दूसरों का के अधिकार की वस्तुएं नही लेते, मनुष्य तो दूसरों का अधिकार मार रहा है l
  15. हमारी कमाई में किसी दूसरे के अधिकार का एक रूपये न हो इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए l 
  16. कुछ करना है तो दूसरों की सेवा करो-कुछ जानना चाहते हो तो अपने आप को जानी -मानना चाहते हो तो भगवान् को मानो- तीनो का परिणाम एक ही होगा
  17. हमे जिस व्यक्ति या वस्तु से मोह (जुड़ाव) हो, उसमे भी भगवान को ही देखना चाहिए l
  18. प्रत्येक समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम किसी की हानि तो नही कर रहे हैं ?
  19. जैसे बच्चा प्रत्येक स्थिति में माँ को ही पुकारता है इसी प्रकार भक्त को भी प्रत्येक स्थिति में भगवान को ही पुकारना चाहिए l 
  20. जिस कार्य को बाद में सीधा नही किया जा सके, उस उल्टेकार्य को कभी नही करना चाहिए l
  21. चरित्र की सुन्दरता ही वास्तविक सुन्दरता है l
  22. कितने आश्चर्य की बात है कि भगवान की दी हुई वस्तुएं अच्छी लगती है परन्तु भगवान नही अच्छे लगते l




गीताप्रेस सुविचार भाग 3

भगवान श्रीरामके चरित्र बड़े अलौकिक थे l इसी आदर्शको हिंदु-संस्कृति कहते हैं l हमें उसी आदर्शको लक्ष्यमें रखकर उसका अनुसरण करना चाहिये l हिंदु-संस्कृतिके स्वरूपको बतलानेके लिये रामायण एक महान आदर्श ग्रन्थ है l सभीको यह ग्रन्थ पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना चाहियl
हमारे हृदयोंमें भगवान् छिपे हुए हैं; क्योंकि जिस विश्वाससे भगवान् प्रकट होते हैं, वह विश्वास हममें नहीं है ।

🚩ये संसार तो नि:सार है,इसका सार तो केवल भगवान ही जानते हैं l 

🔸वह कुल पवित्र हो गया🔸वो देश पवित्र हो गया 🙏जहाँ हरि के दास ने जन्म लियाl

💖हमेशा भगवान के नाम का कीर्तन और भगवान की कथा का गान होने से मन में अखंड आनंद बना रहता है

🌞भगवान के प्रेमी भक्त जहाँ भगवान के नाम का कीर्तन करते हैं, भगवान तो वहीं रहते हैं l

भगवान के वचन हैं – मेरे भक्त प्रेम से जहाँ मेरे नाम का कीर्तन करते हैं, वहां तो मैं स्वयं रहता हूँ, मैं और कहीं न मिलूं तो मुझे वहां ढूंढो l

भगवान के नाम का कीर्तन करने से संसार का दुःख दूर होता है, हर जगह महासुख भर जाता है l कीर्तन से तो वैकुण्ठ धरती पर आ जाता है l

भगवान स्वके हृदय का भाव जानते हैं, उन्हें बताना नही पड़ता l

किसी वस्तु की कामना करने वाले मनुष्य की जब एक इच्छा पूरी होती है तब दूसरी नई इच्छा उत्पन्न हो जाती है, इस प्रकार तृष्णा एक तीर की तरह मनुष्य के पेट पर चोट करती ही रहती है l

छोटे बड़े सबका शरीर नारायण का ही शरीर है l

हम भगवान् से एक पल के लिए भी अलग नही हो सकते और संसार से हमेशा हमेशा के लिए जुड़े भी नही रह सकते 

प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहने की समझ सत्संग से ही आती है l

यदि भीतर सच्ची लग्न नही हो तो सत्संग की बातें पचती नही l

भगवान के भक्त को अपने आप से ये प्रश्न करना चाहिए कि आप मुझसे किसी को कोई लाभ नही हुआ, किसी की सेवा नही हुई, किसी के मन को शांति नही मिली तो मैं कैसा भक्त हुआ ?

     🌞हे प्रभु तुम्हारे नाम का कीर्तन छोड़ कर अब मैं और कोई काम नही करूँगा, अब लज्जा छोड़ कर तुम्हारे रंग में नाचूँगा l 





गीताप्रेस सुविचार भाग 2

जैसा अन्न वैसी बुद्धि l जैसा संग वैसी बुद्धि l अतएव सज्जनका संग करो l आत्माका कल्याण करनेवाली पुस्तक पढ़ो और मेहनत करके अपने हकका खाओ l- 

मनुष्य संसारमें जितनी चीजोंको अपनी और अपने लिये मानता है उतना ही वह फँसता है l

एक संत ने कहा है -लोगोंके छिपे हुए ऐब जाहिर मत करो l इससे उसकी इज्जत तो जरूर घट जाएगी, पर तेरा तो ऐतबार ही उठ जाएगा l

चरित्र एक वृक्ष है, मान एक छाया। हम हमेशा छाया की सोचते हैं, लेकिन असलीयत तो वृक्ष ही है।

ऊपर से हम अपनेको जितना अच्छा दिखाते हैं उससे कहीँ अच्छा हमें अन्दर से होना चाहिये l





शरीर-इंद्रियां-मन-बुद्धिसे अपना सम्बन्ध न रखना ही सच्चा एकान्त है l 

किसी तरह भगवान में लग जाओ, फिर भगवान अपने-आप सम्भालेंगे l

संसार अधूरा है, इसलिये अधूरा ही मिलता है और परमात्मा पूरे हैं, इसलिये पूरे ही मिलते हैं l

परमात्मा दूर नहीँ हैं, केवल उनको पानेकी लगनकी कमी है l

जीव जब लायक होता है, तब भगवान दर्शन देते हैं l जीव लायक नहीँ है, इसलिये भगवान दर्शन नहीँ देते l

आपकी प्रेरणाके बिना मन पाप नहीँ कर सकता है l मन स्वतन्त्र नहीँ है, मन नौकर है l आप अपने मन को सत्कर्ममें लगा दो l नहीँ तो, वह पाप करेगा l

.💖मन की एक बात बहुत अच्छी है, इसे जिस बात का चस्का लग जाये ये फिर उसे नही छोड़ता

💖 इसलिए इसे भगवान के नाम के कीर्तन का चस्का लगवा देना चाहिए l

💖हमेशा भगवान के नाम का कीर्तन और भगवान की कथा का गान होने से मन में अखंड आनंद बना रहता है
बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनता से मिलता है)।

गीताप्रेस सुविचार भाग 1


प्रश्न:- वैराग्य किसे कहते हैं ?
उत्तर:- वैराग्य का अर्थ है संसार में प्रीती नही होना l

प्रश्न:- उपरान्ता किसे कहते हैं ?
उत्तर:- संसारी पदार्थों में वृत्ति न जाना ही उपरान्ता है l

भक्ति के मार्ग में प्रेम की प्रधानता है l

कर्म योग में स्वार्थ के त्याग की प्रधानता है l

ध्यान योग में आलस्य और विक्षेप के त्याग की प्रधानता है l

ज्ञान के मार्ग में परमात्मा के तत्व का ज्ञान प्रधान है l

किसी की भी आत्मा को दुःख पहुंचे ऐसे कार्य के नजदीक भी नही जाना चाहिए l





एक आदमी गरीब से गरीब है और एक आदमी राजा महाराजा है पर भगवान के घर में दोनों का एक समान ही सम्मान है l

राग, द्वेष ही समस्त अनर्थों के मूल हैं l

जितना राग, द्वेष कम हो गया उतना ही उत्थान समझना चाहिए और जितना ही राग, द्वेष अधिक है उतना ही पतन समझना चाहिए l

किसी के अवगुणों की आलोचना नही करनी चाहिए, दूसरों की आलोचना करने से पतन होता है l

यदि कोई हमारी निंदा करता है तो इससे हमे प्रसन्न होना चाहिए l

यदि कोई बिना अपराध किये हमारा बुरा करता है तो इसे भगवान का भेजा हुआ पुरस्कार समझ कर प्रसन्न होना चाहिए l

जैसे स्वार्थी आदमी कार्य करते समय यह सोचता है कि इस कार्य को करने से मुझे क्या लाभ होगा उसी तरह निष्काम कर्म करने वाले को यह
सोचना चाहिए कि इस कार्य को करने से दूसरों का क्या लाभ होगा ?

मित्भाषी बनना चाहिए अर्थात थोडा बोलना चाहिए l

सत्य, हितकारी और प्रिय वचन बोलना चाहिए l

अधिक बोलने से गलती हो सकती है l

जहाँ तक हो सके छोटे से छोटे जीव को भी हमारे द्वारा कोई हानि न पहुंचे इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए l

गीता हमें त्याग सिखाती है – आसक्ति का त्याग, अहंकार का त्याग, ममता का त्याग l




हर एक भाई-बहन को त्याग सीखना चाहिए, स्वार्थ के त्याग के बिना कभी कल्याण नही हो सकता l

किसी के साथ व्यवहार करते समय हमे यह अवश्य सोचना चाहिए कि दूसरे का हित कैसे हो ?

जैसे लोभी आदमी यह सोचता रहता है कि पैसा कैसे मिले उसी प्रकार साधक को यह सोचते रहना चाहिए कि भगवान कैसे मिलें l

मान को विष के समान समझना चाहिए और अपमान को अमृत के समान समझना चाहिए l

हमे परमात्मा की प्राप्ति में देरी हो रही है, इसका कारण है कि हम में स्वार्थ का त्याग नही है, इसलिए स्वार्थ का त्याग करना चाहिए l

चाहे भक्त हो चाहे ज्ञानी हो – समता हो, क्षमा हो परन्तु अहंकार का नाश हो l

यदि समता नही है तो भक्त भक्त नही है और ज्ञानी ज्ञानी नही है l

यदि निंदा करनी है तो अपनी करो और स्तुति करनी है तो दूसरों की करो l


साधक को चाहिए कि वह अपने गुणों को छिपाए और अवगुणों को प्रकट करे और दूसरों के अवगुणों को छिपाए और गुणों को प्रकट करे, यही कल्याण का सरल मार्ग है l


from Amrit wachan booklet Gitapress

हनुमानप्रसाद पोद्दार जी के कथन

स्त्री को अबला इसलिए कहते हैं क्योंकि वह अपने बल का प्रदर्शन नही करती ।

पति-पुत्रों के मंगल की कामना से प्रेममयी बनी रहती है ।

हनुमानप्रसाद पोद्दार, गीताप्रेस


🌿पवित्र साधन -🌷

🌷प्रतिदिन 1 लाख बार भगवान के नाम का जप,

🌿किसी का अहित/wrong न सोचना, न करना, न ही किसी के दोष देखना ।

🌷किसी की बुराई, निंदा न करना ।

🌿प्रतिदिन कुछ गरीब की कुछ सेवा करना ।

🌷प्रतिदिन तुलसी जी को जल चढ़ाना और भगवान को अर्पित किया हुआ तुलसी का पत्ता प्रसाद रूप में खाना ।

🌿सब में भगवान है ऐसा सोचना ।

🌷अपना सब कुछ भगवान को ही अर्पण करने का भाव रखना और रात को सोते समय और सुबह उठते समय अपना सब कुछ भगवान को अर्पण करने का भाव रखना ।

🌿घरवालों के उपकार, प्यार को ही याद रखना ।

🙏ये कुछ पवित्र साधन हैं जिन्हें जीवन में उतारना चाहिए ।

हनुमानप्रसाद पोद्दार जी के कथन
गीताप्रेस🙏

साधन-कल्पतरु गीताप्रेस

🙏गीता- महिमा🙏

🙏यदि मनुष्य का जन्म पाकर किसी ने गीता का अभ्यास नहीं किया, गीता का अध्ययन नहीं किया, गीता के अनुसार अपना जीवन नहीं बनाया तो उसका जन्म व्यर्थ है |

🙏हमको ऐसा अभ्यास करना चाहिए कि हमारी वाणी में गीता, हमारे हृदय में गीता, हमारे कानों में गीता, हमारे कंठ में गीता, हमारे रोम-रोम में गीता और हमारे जीवन में गीता भरी हो—वह गीतामय हो |

🙏 जो ऐसा है, उसी के लिए हम कह सकते हैं कि उसका जीवन धन्य है, उसके माता-पिता धन्य हैं |

🙏          ऐसा पुरुष संसार में गीता का प्रचार करके अपना ही नहीं, हजारों-लाखों व्यक्तियों का उद्धार कर सकता है | आज तुलसीदासजी नहीं हैं, किन्तु उन्होंने रामायण की रचना करके संसार का बड़ा भारी उपकार किया है | उससे हजारों का उद्धार हो रहा है और जबतक वह रहेगी, उद्धार होता रहेगा |
   
🙏    इसी प्रकार जो मनुष्य गीता का अच्छी प्रकार अनुशीलन करके उसके अनुसार अपना जीवन बना लेता है, अपने जीवन को गीता के प्रचार में लगा देता है, उस पुरुष के द्वारा ही वस्तुतः संसार में गीता के भावों का प्रचार होता है | उसके द्वारा भविष्य में भी कितनों का उद्धार होता रहेगा, कहा नहीं जा सकता |

🙏साधन-कल्पतरु गीताप्रेस🙏






🔸🔸🔸साधन-कल्पतरु, गीताप्रेस🔸🔸🔸

🔸एकान्त में बैठकर नित्य यह विचार करे की

🔸 ईश्वर क्या है ?
🔸 मैं कौन हूँ ? 
🔸मैं कहाँ से आया हूँ ? 
🔸मैं क्या कर रहा हूँ ?
🔸 मुझे क्या करना चाहिये ?

 🔸इस प्रकार विचारकर दिन-पर-दिन अपनी उन्नति में अग्रसर होना चाहिये ।







🌹मनुष्य-शरीर पाकर यदि परमात्मा की प्राप्ति नहीं हुई, तो यह जन्म व्यर्थ ही गया । मानव जन्म का समय बहुत ही दामी है, इसको सोच-समझ कर बिताना चाहिये ।

🌹भगवत्प्राप्ति के जितने भी साधन है, उन सबमे उत्तम-से-उत्तम साधन है-भगवान को हर समय याद रखना । चाहे भक्ति का मार्ग हो, चाहे ज्ञान का, चाहे योग का । सभी मार्गोंमें भगवान की स्मृति की ही परम आवश्यकता है ।

साधन-कल्पतरु, गीताप्रेस




🔸  यदि भूलसे बालक साँपको खिलौना समझकर पकड़ने दौड़ता है अथवा अग्निमें हाथ डालता है तो माता-पिता उसे तुरन्त बचा लेते है, साँप अथवा अग्निका स्पर्श नहीं करने देते; क्योंकि उनकी दृष्टि सदा उस अबोध बालक पर रहती है। 

 🔸 इसी तरह जो भक्त अपनेको अबोध शिशु की भाँति भगवान् के ऊपर छोड़ देता है, उसकी सँभाल भगवान् स्वयं करते है, उसे कभी गड्ढेमें गिरने नहीं देते, भूलसे वह गड्ढेकी ओर जाता भी है तो उसे खींचकर बचा लेते हैं।

 🔸इसलिए अबोध शिशु जिस प्रकार माताके परायण dependent होता है, उसी प्रकार तुम भगवान् के परायण dependent हो जाओ। फिर तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं होगा। 

 दैनिक कल्याण सूत्र गीताप्रेस,गोरखपुर






आत्मोन्नतिमें सहायक बातें -९-

. मनुष्य संसार में लोग अपनी निन्दा करें, अपमान करें तो उससे अपने को खुश होना चाहिये और यदि लोग अपनी प्रशंसा करे, सम्मान करे तो उससे लज्जित होना चाहिये ।

कुसंग कभी न करे । मनुष्य सत्संग से तर जाता है और कुसंग से डूबता है ।

सत्संग में सुनी हुई बातों को एकान्त में बैठकर मनन करे और उनको काम में लाने की पूरी चेष्टा करे ।

पाप, भोग, आलस्य और प्रमाद-ये चार नरक में ले जानेवाले है । इनका सर्वथा त्याग करे ।

यह निश्चय कर ले की प्राण भले ही चले जाँय पाप तो कभी करना ही नहीं है । भारी-से-भारी  आपति आ जाय, तब भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये और सदा ईश्वर को याद रखना चाहिये ।

मनुष्य जो चिंता, भय, शोक से व्याकुल होता है, इसमें प्रारब्ध हेतु नहीं है । सिवा मूर्खता के इनके होने का कोई अन्य कारण नही है । मनुष्य थोडा-सा विचार करके इस मूर्खता को हटा दे तो से सरलता से मिट सकते है ।.....



—श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर




गीताप्रेस के सुविचार

हम भगवान से एक पल हेतु भी अलग नही हो सकते और संसार से हमेशा के लिए जुड़े भी नही रह सकते l

हम संसार की जिन जिन वस्तुओं को महत्व देते हैं वे हमे भगवान के साथ जुड़ने नही देंगी और न ही हमेशा के लिए हमारे साथ रहेगी l


प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहने की समझ सत्संग से ही आती है l
यदि अंदर सच्ची लगन नही हो तो सत्संग बातें पचती नही l

समय का सही उपयोग करने वाला व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में सफल नही हो सकता l

विचार करें कि अब तक का जीवन में जो हमे समय मिला था उसमे हमने कितना भाग धर्म को दिया ?

भगवान के भक्त को अपने आप से ये प्रश्न करना चाहिए कि यदि मुझसे किसी को कोई लाभ नही हुआ, किसी की सेवा नही हुई, किसी के मन को शांति नही मिली तो मैं कैसा भक्त हुआ ?

जो पाप कर्मो से जितना बचता है वो उतना ही बड़ा परमात्मा का भक्त है l

भगवान का नाम जपते समय संसार के बारे में नही सोचना चाहिए और संसार के काम करते समय भी भगवान को नही भूलना चाहिए l


जैसे व्यापार/व्यवसाय वो बढिया होता है जिसमे अधिक लाभ हो ऐसे ही साधना वो बढिया होती है जिसमे अधिक मन भगवान में लगे l



जिसने बचपन से ही या युवावस्था में भक्ति नही कि वो बुढापे में क्या भक्ति करेगा ?

जैसे जैसे समाज में लोग केवल संसार और संसार में उपलब्ध भौतिक वस्तुओं को ही महत्व देना आरम्भ करते हैं और धर्म की उपेक्षा/अवहेलना (ignore) करते हैं, वैसे ही समाज में अशांति, अपराध, पाप बढ़ते हैं या यूं कहें कि धर्म की उपेक्षा/अवहेलना करेंगे तो अधर्म बढ़ता ही है l

जब तक हमे संसार ही अच्छा लगता रहेगा तब तक हमे परम शांति नही मिल सकती l

भक्त को सदा दूसरों की सेवा करने का लालक होना चाहिए, दूसरों को सुख देकर भक्त स्वयं वहाँ पहुँच जायेगा जहाँ उसको कभी कोई दुःख नही होगा l

दुःख आता ही इस हेतु है कि सुख की इच्छा ही छूट जाए l

जो अपने सुख से सुखी होता है, वो एक दिन दुखी ही होगा, जो दूसरों के सुख से सुखी होता है उसका दुःख एक दिन सदैव के लिए मिट जायेगा l

संसार से मोह करोगे तो दुखों का अंत नही है और भगवान से मोह करोगे तो सुखों का कोई अंत नही है l

सुख पाना चाहते हो तो पहले दूसरों को दुःख दो जैसे बीज बोयोगे वैसी ही फसल काटोगे l

जो दूसरों का बुरा करता है वो वास्तव में अपना ही बुरा कर रहा है और जो दूसरों का भला कर रहा है वो वास्तव में अपना ही भला कर रहा है l

दूसरे सुखो हों – जब व्यक्ति यह भाव रखेगा तो सब सुखो हो जायेंगे और स्वयं भी सुखी हो जायेगा परन्तु...
मैं सुखी हो जाऊं – जब व्यक्ति यह भाव रखेगा तो सब दुखी हो जायेंगे और व्यक्ति स्वयं भी दुखी हो जायेगा l

जो भी दुःख भोग रहा है वो आगे सुखो हो सकता है परन्तु जो दुःख दे रहा है वो कभी सुखी नही हो सकता l
भक्त को संसार में इसलिए रहना है ताकि वो संसार की सेवा कर सके न कि संसार से सुख ले l

जैसे किसी कम्पनी में अच्छा काम करने से कम्पनी का मालिक प्रसन्न हो जाता है ऐसे ही संसार की सेवा करने से संसार के मालिक (भगवान) भी प्रसन्न हो जाते हैं l

श्रेष्ठ भक्त वही है जो दूसरों की भलाई में लगा हुआ है l

जो सबका भला चाहता है वो भगवान के हृदय में स्थान पाता है l

जो दूसरों का भला कर रहा है वह कहीं भी रहे भगवान को पा लेगा l

संसार में दूसरों के लिए जैसा करोगे अपने लोहे भी वैसा हो जायेगा, इस हेतु सदैव दूसरों का भला करो l

जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को छोड़ कर दूसरों की भलाई करता है, उसका जीवन ही वास्तव में जीवन है l

जब कभी सेवा का अवसर मिले तो प्रसन्न होना चाहिए कि जैसे भाग्य खुल गया l


धार्मिक पुस्तकें, अच्छे विचारों और सत्संग से बुरा स्वभाव भी अच्छा हो जाता है l
आज के समय में तो मनुष्य पशुओं से भी नीचे गिर रहा है, क्योंकि पशु भी दूसरों के अधिकार की वस्तु नही लेते, मनुष्य तो दूसरों का अधिकार मार रहा है l

हमे कमाई में किसी दूसरे के अधिकार का एक रुपया भी न हो इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए l

1. कुछ करना चाहते हो तो दूसरों की सेवा करो l
2. कुछ जानना चाहते हो तो अपने आप को जानो l
3. मानना चाहते हो तो भगवान को मानो l
तीनो का परिणाम एक ही होगा l

हमे जिस भी व्यक्ति या वस्तु से मोह हो, उसमे भी भगवान को ही देखना चाहिए l

हर समय ये जरूर ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम किसी का बुरा तो नही कर रहे हैं ?


जैसे बच्चा प्रत्येक स्थिति में माँ को ही पुकारता है ऐसी ही भक्त को भी प्रत्येक स्थिति में भगवान को ही पुकारना चाहिए l

जिस काम को बाद में सीधा नही किया जा सके उस उलटे काम को कभी करना नही चाहिए l
सच्ची बात को हमेशा स्वीकार करना चाहिए l

चरित्र की सुन्दरता ही वास्तविक सुन्दरता है l

कितने आश्चर्य की बात है कि भगवान की दी हुई वस्तु अच्छी लगती है परन्तु भगवान अच्छे नही लगते l

जो भगवान, गुरु, ग्रन्थों से डरता है वही सच्चा वीर है l

1.   कोई हमे अपनी ख़ुशी से कोई वस्तु दे तो वह वस्तु दूध जैसी है l

2.   हम किसी वस्तु को मांग कर लें तो वो वस्तु पानी है l

3.   हम किसी वस्तु को छीन कर दूसरों का दिल दुखा कर लें तो वो वस्तु रक्त जैसी है l

जब हम सबकी बात नही मानते तो दूसरा हमारी बात नही मानता तो हमे नाराज नही होना चहिये l




सच्चे धार्मिक व्यक्ति को दुनिया की कोई वस्तु नही चहिये बल्कि दुनिया ही उसके पीछे फिरती है l
धर्म के अनुसार स्वयं चलना ही धर्म का सबसे बड़ा प्रचार है l

धर्म का मूल है:-
स्वार्थ को छोड़ना और दूसरों का भला करना l


भारत में जन्म लेकर भी मनुष्य धर्म में n लगे ये बड़े आश्चर्य और दुःख की बार है क्यूंकि धर्म ही तो भारत की अरमा है, भारत में जन्म मिलना अर्थात भगवान की कृपा होना, भारत में जन्म ही धर्म की प्राप्ति के लिए मिलता है l